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निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण: Remedial Teaching In Mathematics

Remedial Teaching In Mathematics

इस पोस्ट में हम Remedial Teaching In Mathematics (उपचारात्मक शिक्षणका अध्यन करेगे रहे हैं। इस आर्टिकल में आप निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण  के अंतर्गत जानेगे निदानात्मक परीक्षण के प्रकार,निदानात्मक  शिक्षण में नैदानिक परीक्षण के उद्देश्य,नैदानिक परीक्षण के चरण,उपचारात्मक शिक्षण के उद्देश्य,बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण की प्रक्रिया से संबंधित संपूर्ण जानकारी  जोकि समस्त शिक्षक भर्ती परीक्षा जैसे CTET, UPTET, REET, MPTET, HTET, 2nd grade की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आशा है यह जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित होगी। 

Diagnostic and Remedial Teaching (निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण)

जैसा एक डॉक्टर रोगी का उपचार करने से पहले उसकी बीमारी की  प्रकृति, प्रकार तथा लक्ष्मण का निदान करता है। ठीक उसी प्रकार गणित शिक्षक छात्रों को गणित के अध्ययन में क्या क्या कठिनाई है। वह कहां गलतियां करते हैं,  किस प्रकार की गलती करते हैं, तथा क्यों करते हैं आदि का पता लगाने के लिए निदानात्मक परीक्षण करते हैं। 

निदान का अर्थ होता है- जानना या पता लगाना शिक्षक पहले निदानात्मक शिक्षण द्वारा छात्रों की कठिनाइयां का निदान करते हैं।  तदोपरांत इनको अपनी व्यक्तिगत कठिनाइयों से मुक्त करने के लिए  उपचारात्मक शिक्षण( remedial teaching ) का प्रयोग करते हैं। 

योकम व  सिंपसन “उपचारात्मक शिक्षण उचित रूप से निदानात्मक शिक्षण के बाद आता है।”

अतः प्रभावी शिक्षण तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए निदानात्मक शिक्षण तथा उपचारात्मक शिक्षण बहुत जरूरी है। 

 नैदानिक परीक्षण में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

  • उन विद्यार्थियों को खोजना, जिन्हें सहायता चाहिए
  • त्रुटियां कहां हो रही है?
  • त्रुटि क्यों हो रही है?

निदानात्मक परीक्षण का मुख्य उद्देश विश्लेषण करना है ना कि आकलन करना निदानात्मक परीक्षण गुणात्मक होते हैं ना कि मात्रात्मक। 

 Types of diagnostic tests (निदानात्मक परीक्षण के प्रकार)

(1)  शैक्षिक निदानात्मक परीक्षण (Educational diagnostic test)

(2)  शारीरिक निदानात्मक परीक्षण (Physical diagnostic test)

Objectives of diagnostic testing in diagnostic education (निदानात्मक  शिक्षण में नैदानिक परीक्षण के उद्देश्य )

1.  गणित संबंधी कमजोरियों एवं विशिष्टता का पता लगाना। 

2. पिछड़े बालकों की पहचान करना। 

3.  गणित विषय की अध्ययन- अध्यापन प्रक्रिया में सुधार करना। 

4.  उपचारात्मक शिक्षण की  व्यवस्था करना। 

5.  गणित के पाठ्यक्रम में परिवर्तन लाना तथा बाल केंद्रित बनाना। 

6.   मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने हेतु मूल्यांकन पद्धतियों में परिवर्तन करना। 

7.  छात्रों की कमियों एवं अच्छाइयों के आधार पर शैक्षणिक निर्देशन देना तथा उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग करना। 

Steps of diagnostic testing (नैदानिक परीक्षण के चरण)

शैक्षणिक निदान की मुख्य रूप से पांच चरण माने जाते हैं जिनके आधार पर प्रक्रिया को बनाया जाता है। 

1.  यह पता करना कि वह कौन से छात्र है जो कठिनाई का सामना कर रहे हैं अर्थात समस्यात्मक बालक की पहचान करना। 

2.  यह जानना कि बालक से त्रुटि कहां हो रही है। 

3.  कठिनाई/ त्रुटि की प्रकृति को जानने के बाद यह जानना की त्रुटियों के कारण क्या है। 

  • बच्चे में ध्यान ना दिया हो
  • अनियमित  उपस्थिति
  • बीमारी
  • विषय की कठिनाई
  • समझ का स्तर

4.   कारण पता हो जाने के बाद उस पर विचार किया जाता है, कि उपचार क्या किया जाए उपचार समस्या की प्रकृति पर निर्भर करता है। 

5.  उपचार देने के बाद ही यह क्रिया समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि यह समस्या उत्पन्न ही ना हो.।  

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उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching In Mathematics )

advantages of remedial teaching
remedial teaching in mathematics

उपचारात्मक शिक्षण( remedial teaching ) के द्वारा एक शिक्षक अपने छात्रों के अधिगम संबंधी दोहे तथा कठिनाइयों को  दूर करके उनकी गति के पद को प्रशस्त करने का प्रयास करता है। जिस प्रकार एक डॉक्टर व्यक्तियों के विभिन्न रोगों का उपचार करके उनको उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने की चेष्टा करता है।  उसी प्रकार शिक्षक छात्रों को अधिगम संबंधी 200 एवं कठिनाइयों से मुक्त करके उनको ज्ञान अर्जन की उचित दिशा की ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं।

प्लेयर, जॉन व सिंपसन – ” उपचारात्मक शिक्षण वास्तव में उत्तम शिक्षण है।जो छात्रों को अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान प्रदान करता है और जो तू प्रेरित क्रियाओं द्वारा उसको अपनी कमजोरियों के क्षेत्रों में अधिक योग्यता की दिशा मे  अग्रसर करता है। “

योकम व सिंपसन -“उपचारात्मक शिक्षण  मैं इस विधि को खोजने का प्रयास करता है ,जो छात्र को अपनी कुशलता या विचार की  त्रुटियों को दूर करने में सफलता प्रदान करें।”

principles of Remedial Teaching  (उपचारात्मक शिक्षण के सिद्धांत)

1.  सुधारात्मक सामग्री को छात्र की कठिनाइयों को दूर करने के अनुसार डिजाइन करना चाहिए। 

2.  उपचारात्मक शिक्षण छात्रों की आयु, रुचि, योग्यता एवं अनुभवों के अनुकूल होना चाहिए। 

3 .अध्यापक को निदानात्मक परीक्षण  के निर्माण में दक्ष होना चाहिए। 

4. उपचारात्मक शिक्षण के दौरान बालकों की रूचि को बनाए रखने के लिए उन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन देते रहना चाहिए। 

5.  प्रक्रिया के समय छात्र को ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहना चाहिए। 

6.. छात्र को अपनी सफलता के संबंध में शीघ्र परिणाम मिलने चाहिए। 

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Objectives/ Aim of Remedial Teaching  (उपचारात्मक शिक्षण के उद्देश्य)

1. छात्रों की अधिगम संबंधी कठिनाइयां, दोष तथा त्रुटियों का अंत करना। 

2. छात्रों के अधिगम संबंधी दोष तथा त्रुटियों को इस प्रकार से दूर करना कि छात्र उन्हें भविष्य में पुनः दोहराए ही नहीं। 

3.  छात्रों की दोषपूर्ण आदतों एवं मनोवृति को समाप्त करना। 

4.  छात्रों में उन आवश्यक आदतों को संस्थाओं को दिखाना जो उनके द्वारा सीखी नहीं गई है। 

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Process of Remedial Teaching for children (बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण की प्रक्रिया )

  • गणित में कमजोर छात्रों को आगे बैठाना चाहिए। 
  • कक्षा में उदाहरणों का चरण विषय वस्तु एवं कठिनाई के स्तर को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। 
  • छात्रों को कक्षा में तर्क तथा सोचने के अवसर देने चाहिए। 
  • प्रत्येक छात्र के 200 एवं बूटियों का व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करके उसे उनको दूर करने के उपाय बताना चाहिए। 
  • छात्रों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित करके उनकी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा प्रदान करना चाहिए। 
  • छात्रों को क्रियाशील रखने के लिए प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग करना चाहिए। 
  • अभी कमजोर छात्रों को कक्षा के बाद आवश्यकता अनुसार परामर्श देकर गणित सीखने में सहायता करनी चाहिए। 
  • समस्याओं को हल करते समय स्पष्ट तथा सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए। 
  • अंक गणित तथा बीजगणित के आधारभूत उप विषयों को पढ़ाते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए जैसे कि दशमलव, प्रतिशत,  अनुपात, समीकरण आदि. 
  • श्यामपट्ट पर लिखी हुई सामग्री व्यवस्थित स्पष्ट एवं उपयोगी होनी चाहिए। 
  • कमजोर छात्रों को कक्षा में पर्याप्त अभ्यास कराना चाहिए। 
  • ऐसे छात्रों को हतोत्साहित  नहीं करना चाहिए। 

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