Child Development and Pedagogy

बाल विकास के प्रमुख सिद्धांत | Child Development Principles in Hindi for CTET & ALL TEACHERS EXAM

बाल विकास के प्रमुख सिद्धांत (Child development principles)

सभी शिक्षक भर्ती परीक्षाओ मे बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र विषय के अंतर्गत बाल विकास के प्रमुख सिद्धांत (bal vikas ke pramukh siddhant) पूछ लिए जाते है  यहा हम child development and pedagogy इस महत्वपूर्ण टॉपिक पर विस्तार से जानकारी आपके साथ शेअर कर रहे है जो की निश्चित ही आपको आगामी शिक्षक भर्ती परीक्षाओ के लिए सहायक होगी।

विकास के सिद्धांत (Principle of Development)

 जब बालक विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करता है। तब हम उस में कुछ परिवर्तन देखते हैं। अध्ययनों  के द्वारा यह सिद्ध कर दिया गया है कि यह परिवर्तन निश्चित सिद्धांतों के अनुसार होते हैं।  इन्हीं को विकास के सिद्धांत कहा जाता है। 

1.  निरंतर विकास का सिद्धांत (Principle of continuous growth)

  •  इसके अनुसार विकास की प्रक्रिया निरंतर गति से चलती रहती है।
  • यह गति कभी तीव्र और कभी मंद होती है।  जैसे प्रथम 3 वर्षों में बालक के विकास की प्रक्रिया बहुत तीव्र और इसके बाद मंद पड़ जाती है। 
  •  इसी प्रकार शरीर के कुछ भागों का विकास तीव्र गति से और कुछ भागों का मंद गति से होता है।  पर विकास प्रक्रिया चलती रहती है। 

2. विकास की विभिन्न गति का सिद्धांत  (Principle of different rule of growth)

डग्लस और हॉलैंड के अनुसार-  विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति में विभिन्नता होती है। यह विभिन्नता विकास के संपूर्ण काल में बनी रहती है।  उदाहरण- जो व्यक्ति जन्म के समय लंबा होता है, वह साधारण ताप बड़ा होने पर भी लंबा रहता है, एवं जो व्यक्ति छोटा होता है वह बड़े होने पर भी छोटा होता है। 

3. विकास क्रम का सिद्धांत (Principle of development sequence)

 बालक का गामक और भाषा संबंधी आदि विकास एक निश्चित क्रम में होता है।  जैसे- जन्म के समय बालक की बल रोना जानता है, तीन माह में एक विशेष आवाज निकालने लगता है।  7 माह में वह माता-पिता के लिए ‘पा’ ‘बा’ ‘दा’आदि शब्दों का प्रयोग करने लगता है। 

4.  विकास दिशा का सिद्धांत (Principle of development direction)

  • बालक का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है।  उदाहरण- प्रथम सप्ताह में बालक केवल सिर को उठा पाता है। 
  •  पहले 3 माह में वह अपने नेत्रों की गति पर नियंत्रण करना सीख जाता है।  6 माह में अपने हाथों की गतियां पर अधिकार कर लेता है तथा 9 माह में वह सहारा लेकर बैठने लगता है।  12 माह में वह स्वयं बैठकर और घिसट कर चलने लगता है। 

5. एकीकरण का सिद्धांत (Principle of integation)

इसके अनुसार बालक पहले संपूर्ण अंक और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है।  उसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है।

उदाहरणार्थ-  वह पहले पूरे हाथ को, फिर उंगलियों को एवं सिर हाथ एवं अंगुलियों को एक साथ चलाना सीखता है। 

6.परस्पर संबंध का सिद्धांत 

बालक की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक आदि पहलुओं  के विकास में परस्पर संबंध होता है।  उदाहरणार्थ-  जब बालक शारीरिक विकास के साथ साथ व्यवहार में परिवर्तन होते हैं, तब साथ-साथ भाषा संबंधी विकास भी होता है। 

7. सामान्य व विशिष्ट प्रतिक्रियाओं का सिद्धांत (Principle of general and specific reactions)

 बालक का विकास सचिव सामान्य से विशिष्ट की ओर चलता है। नवजात शिशु अपने शरीर के किसी अंग का प्रयोग करने से पूर्व अपने शरीर का संचालन करता है।

उदाहरणार्थ-  उंगलियों का प्रयोग करने से पूर्व संपूर्ण हाथ का प्रयोग करना सीखता है। 

8. वंशानुक्रम एवं वातावरण की अंतः क्रिया का सिद्धांत (Principle of inheritance and interaction of environment)

 बालक का विकास न केवल वंशानुक्रम के कारण और ना केवल वातावरण के कारण  वरन दोनों की अंतः क्रिया के कारण होता है। अर्थात बालक के विकास पर वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है। 

9. वैयक्तिक विभिन्नता ओं का सिद्धांत (Principle of individual differences)

 इसके अनुसार प्रत्येक बालक के विकास का अपना स्वयं का स्वरूप होता है।  इस स्वरूप में वैयक्तिक विभिन्नता आएं पाई जाती है।  एक ही आयु के 2 बालकों के शारीरिक, मानसिक आदि विकास में वैयक्तिक विभिन्नताओं को देखा जा सकता है। 

10. समान प्रतिमान का सिद्धांत (Principle of uniform pattern)

 प्रत्येक जाति, चाहे वह मानव जाति हो या पशु जाति अपनी जाति के अनुरूप विकास के प्रतिमान का अनुसरण करती है।  उदाहरणार्थ- पूरे संसार में मानव जाति के शिशुओं के विकास का प्रतिमान (Pattern) एक ही होता है। 

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